Monday, 8 June 2015

झुला.........
प्रत्येकाचा झुला वेगळा
झुलणे परि कोणास ना टळे

झुलणे किती कसे नि कुठवर
नाहि उमगले कोणा आजवर

पण उमजुनी सत्यार्थ जो झुले
त्याचे झुलणे बकुळ फुले

रश्मि ७/६/२०१





झुला



असंख्य रूपे ह्या झूल्याची
काही दिसती कही न दिसती

मऊ उबदार हात झूला तो
अंगाई गीते गतो
पाळणाहि तो झुलाच असतो
अश्वासक आंदोळण घेतो

बागेमध्धे फळी लाकडी
किंवा टायर वा साडी
मागे पुढती वरती खाली
मुले सर्व गोळा झाली

पडवीमधला झोपाळा तो
सर्वांगाने कुरकुरतो
गाठि शिदोरी संस्कारांची
मूल्यांची बांधुन देतो

आशा निराशा धडपडणे अन
मस्तीत धुंदित वावरणे
तारुण्याचा झुला खरोखर
न दिसे तरि तो अनुभवणे

सायंकाळी कातरवेळी
झुला आपुल्यापरि झुलतो
हळुवार मंद खुर्चीसंगे
मागे पुढती जोजवितो

जीवन हे तर रूप झुल्याचे
जगणे म्हणजे हिंदोळे
जगणे म्हणजे झुलत रहाणे
झुलत झुलत गाणे गाणे
झुलत झुलत गाणे गाणे


रश्मि ६/६/२०१५

Monday, 13 April 2015

Our minds are distant galaxies
With stars being born every sec
The stars and sparks are seen outside
The turmoil remains hidden inside

Rashmi
9-4-15
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The yawing deep void
The emptiness
The nothingness
Staring trying to swallow
Struggle not
Oh poor destitute soul
Let it engulf !
Let it take you
To that distant land
The Destination !

Rashmi
13-4-2015

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